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मूक सवाली

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उन बच्चों के नाम जो दाने दाने के लिए तरसते हैं……..जब मैं खुद बचपने मैं रहती थी…..

 

सूना सा आँगन , सुखी सी धरती

यह बंजर मरुभूमि, काहे न सरसती

वो ठंडा चूल्हा , वो बेरौनक सी चिमनी

न सुलगती लकड़ी, न धधकती अग्नि

क्यों हैं यह सब ??, शायद हम सभी मूक सवाली हैं

भूखे  हैं अनगिनत  मुंह , हाथ भी खाली हैं

 

क्यों ये जर्जर शरीर , क्यों हैं मौत भी पराई

परछाई सी दिखती , पर हाथ न आयी

कंकाल सी जिन्दा लाशे हैं, पर लोगो के लिए तमाशे हैं

क्यों हैं यह सब ??, शायद हम सभी मूक सवाली हैं

भूखे  हैं अनगिनत  मुंह , हाथ भी खाली हैं

 

हाथ फैलाए वो फटेहाल खड़े हैं

सावन मैं भी , पीले पतों से झडे हैं

दया के पात्र , वो लाचारी मैं पाले हैं

भूखे वो बच्चे, ठणडे चूल्हे से जले हैं

क्यों हैं यह सब ??, शायद हम सभी मूक सवाली हैं

भूखे  हैं अनगिनत  मुंह , हाथ भी खाली हैं