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काफिले

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चला जाता हूँ राहों मैं अपनी

अपनी दुनिया के काफिले उठाये

यह दरो दीवार हैं मेरी अपनी

इन मंजिलों को मुठ्ठी मैं दबाये

 

किश्तियाँ तैरती हैं आंगन मैं मेरे

बारिश के टपकते पानी मैं

उड़ती हैं तितलियां फूलो पर

कुछ अहसास दामन मैं छुपाये

 

दुनिया हैं मेरी इतनी हसीं

कही कुछ खो न जाए

रखना ए खुदा अपना हाथ

इस मुसाफिर पर

जन्नतो सा यकीन आ जाये

तेरी दी हुई नैमतो पर


फासले

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फासले हैं कितने और कहा,

किन किन के बीच

दीवारे हैं कितनी, और कहा,

किन किन के बीच

 

जानना चाहे भी,

तय करना चाहे भी

तो नामुमकिन हैं, क्योंकि

दुरिया हैं इतनी, इन हदों के बीच

 

फासले इंसान और उसकी ख्वाहिशों मैं

फासले कितने दिलो की दूरियों मैं

फासले कितने इंसान की मजबूरियों मैं

फासले हैं आते हर पल बनती यादो मैं

 

चाहते हैं कितना, कितनी ही शिद्दत से,

सिमट जाए, हासिल हो जाए

हर तमन्ना, हर सपना

ना रहे दिल की धडकनों से अब दूर कोई

 

पर जिंदगी है हर पल बदलता

इन्द्रधनुष, इन संघर्षों के बीच

तम्मनाओ , भावनाओं, ख्वाहिशो

धडकनों से भरपूर

 

आज तय होता एक फासला,

कई नए फासलो के बीच

और फिर भर जाता दामन,

कर जाता आदमी को मजबूर